Tuesday, 31 July 2012

बाल प्रतिबिम्ब पर आपका स्वागत है। हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकारों ने अनेक कालजयी बाल कविताएँ लिखी हैं, उनमें से कुछ कविताएँ यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं। कुछ आधुनिक कवियों की बाल कविताएँ भी यहाँ प्रकाशित की जा रही हैं। आपको ये कविताएँ कैसी लगीं ? अपनी टिप्पणी के रूप में कविताओं के विषय में आप यहाँ लिख सकते हैं।

-ईप्सा

Monday, 9 July 2012

बादल

-सन्तोष कुमार सिंह
रोज निहारूँ नभ में तुझको,
काले बादल भैया।
गरमी से सब प्राणी व्याकुल,
रँभा रही घर गैया।।

पारे जैसा गिरे रोज ही,
भू के अन्दर पानी।
ताल-तलैया पोखर सूखे,
बता रही थी नानी।।

तापमान छू रहा आसमां,
प्राणी व्याकुल भू के।
बिजली खेले आँख मिचोली,
झुलस रहे तन लू से।।

जल का दोहन बढ़ा नित्य है,
कूँए सूख गए हैं।
तुम भी छुपकर बैठे बादल,
लगता रूठ गए हैं।।

गुस्सा त्यागो, कहना मानो,
नभ में अब छा जाओ।
प्यासी नदियाँ भरें लबालव,
इतना जल बरसाओ।।

छप-छप, छप-छप बच्चे नाचें,
अगर मेह बरसायें।
हर प्राणी का मन हुलसेगा,
देंगे तुम्हें दुआयें।।



-सन्तोष कुमार सिंह

Sunday, 18 December 2011

नटखट हम, हां नटखट हम

-सभामोहन अवधिया 'स्वर्ण सहोदर`

नटखट हम, हां नटखट हम !
नटखट हम हां नटखट हम,
करने निकले खटपट हम
आ गये लड़के आ गये हम,
बंदर देख लुभा गये हम
बंदर को बिचकावें हम,
बंदर दौड़ा भागे हम
बच गये लड़के बच गये हम,
नटखट हम हां नटखट हम !

बर्र का छत्ता पा गये हम,
बांस उठा कर आ गये हम
छत्ता लगे गिराने हम,
ऊधम लगे मचाने हम
छत्ता टूटा बर्र उड़े,
आ लड़कों पर टूट पड़े
झटपट हट कर छिप गये हम,
बच गये लड़के बच गये हम !

बिच्छू एक पकड़ लाये,
उसे छिपा कर ले आये
सबक जांचने भिड़े गुरू,
हमने नाटक किया शुरू
खोला बिच्छू चुपके से,
बैठे पीछे दुबके से
बच गये गुरु जी खिसके हम,
पिट गये लड़के बच गये हम !

बुढ़िया निकली पहुँचे हम,
लगे चिढ़ाने जम जम जम
बुढ़िया खीझे डरे न हम,
ऊधम करना करें न कम
बुढ़िया आई नाकों दम,
लगी पीटने धम धम धम
जान बचा कर भागे हम,
पिट गये लड़के बच गये हम!


-
सभामोहन अवधिया 'स्वर्ण सहोदर`
(1902 - 1980)

एक सवाल


-ठाकुर श्रीनाथ सिंह

आओ, पूछें एक सवाल
मेरे सिर में कितने बाल ?


कितने आसमान में तारे ?
बतलाओ या कह दो हारे

चिड़ियाँ क्या करती हैं बात ?
क्यों कुत्ता बिल्ली पर धाए ?
बिल्ली क्यों चूहे को खाए ?
फूल कहाँ से पाते रंग ?
रहते क्यों न जीव सब संग ?
बादल क्यों बरसाते पानी ?
लड़के क्यों करते शैतानी ?
नानी की क्यों सिकुड़ी खाल ?
अजी, न ऐसा करो सवाल
यह सब ईश्वर की है माया
इसको कौन जान है पाया !
नदिया क्यों बहती दिन रात ?

घूम हाथी, झूम हाथी

-विद्याभूषण 'विभु`

घूम हाथी, झूम हाथी
घूम हाथी, झूम हाथी
घूम हाथी, झूम हाथी
हाथी झूम झूम झूम
हाथी घूम घूम घूम

राजा झूमें रानी झूमें
झूमें राजकुमार
घोड़े झूमें फौजें झूमें
झूमें सब दरबार
झूम झूम घूम हाथी
घूम झूम झूम हाथी
हाथी झूम झूम झूम
हाथी घूम घूम घूम

राज महल में बाँदी झूमे,
पनघट पर पनिहारी
पीलवान का अंकुश झूमें
सोने की अम्बारी
झूम झूम घूम हाथी
घूम झूम झूम हाथी
हाथी झूम झूम झूम
हाथी घूम घूम घूम




-विद्याभूषण 'विभु`
(1892 - 1965)

तिल्ली सिंह

-रामनरेश त्रिपाठी



-
रामनरेश त्रिपाठी
(1889 - 9162)
पहने धोती कुरता झिल्ली
गमछे से लटकाये किल्ली
कस कर अपनी घोड़ी लिल्ली
तिल्ली सिंह जा पहुँचे दिल्ली
पहले मिले शेख जी चिल्ली
उनकी बहुत उड़ाई खिल्ली
चिल्ली ने पाली थी बिल्ली
बिल्ली थी दुमकटी चिबिल्ली
उसने धर दबोच दी बिल्ली
मरी देख कर अपनी बिल्ली
गुस्से से झुँझलाया चिल्ली
लेकर लाठी एक गठिल्ली
उसे मारने दौड़ा चिल्ली
लाठी देख डर गया तिल्ली
तुरत हो गयी धोती ढिल्ली
कस कर झटपट घोड़ी लिल्ली
तिल्ली सिंह ने छोड़ी दिल्ली
हल्ला हुआ गली दर गल्ली
तिल्ली सिंह ने जीती दिल्ली!

Thursday, 6 October 2011

चंदामामा

-रामनरेश त्रिपाठी

चंदामामा गए कचहरी
घर में रहा न कोई
मामी निशा अकेली घर में
कब तक रहतीं सोई।

चली घूमने साथ न लेकर
कोई सखी सहेली
देखी उसने सजी सजाई
सुन्दर एक हवेली।

आगे सुन्दर पीछे सुन्दर
सुन्दर दाएँ बाएँ
नीचे सुन्दरे ऊपर सुन्दर
सुन्दर सभी दिशाएँ।
देख हवेली की सुन्दरता
फूली नहीं समाई
आओ नाचें, उसके मन में
यह तरंग उठ आई।

पहले वह सागर पर नाची
फिर नाची जंगल में
नदियों पर नालों पर नाची
पेड़ों की ओझल में।
फिर पहाड़ पर चढ़ चुपके से
वह चोटी पर नाची
चोटी से उस बड़े महल की
छत पर जाकर नाची।

वह थी ऐसी मस्त हो रही
आगे क्या गति होती
टूट न जाता तार कहीं जो
बिखर न जाते मोती
छूट गया नौलखा हार जब
मामी रानी रोती
वहीं खड़ी रह गई छोड़कर
यों ही बिखरे मोती।

पाकर हाल दूसरे ही दिन
चंदामामा आए
कुछ शरमाकर खड़ी हो गई
मामी मुँह लटकाए।
चंदामामा बहुत भले हैं
बोले क्यों है रोती
दीया लेकर घर से निकले
चले बीनने मोती ।